+ दृढ़चित्त होना आवश्यक - -
कुतर्केऽभिनिवेशोऽतो न युक्तो मुक्ति-कान्क्षिणाम् ।
आत्मतत्त्वे पुनर्युक्तः सिद्धिसौध-प्रवेशके ॥355॥
अन्वयार्थ : अत: मुक्ति-कान्क्षिणां कुतर्के अभिनिवेश: न युक्त: पुन: सिद्धिसौध-प्रवेशके आत्मतत्त्वे (अभिनिवेश:) युक्त: ।
इसलिए मोक्षाभिलाषी साधक-श्रावक एवं मुनिराजों को कुतर्क में अपने मन को अर्थात् व्यक्त विकसित ज्ञान को नहीं लगाना चाहिए; प्रत्युत अपने मन को निजात्म तत्त्व में जोडना अर्थात् दृढ़चित्त होना उचित है और यह कार्य स्वात्मोपलब्धिरूप सिद्धि-सदन में प्रवेश करने के लिए प्रवेश द्वार है ।