
कल्मष-क्षयतो मुक्तिर्भोग-संगमवर्जिनाम् ।
भवाभिनन्दिनामस्यां विद्वेषो मुग्धचेतसाम् ॥379॥
अन्वयार्थ : भोग-संगम-वर्जिनां कल्मष-क्षयत: मुक्ति: । मुग्धचेतसां भवाभिनन्दिनां अस्यां विद्वेष: ।
जो पंचेंद्रियों के स्पर्शादि भोग्यरूप विषयों के संपर्क से रहित हैं अथवा इंद्रिय-विषयों के भोगों से और संपूर्ण बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह से सर्वथा विरक्त हैं, उन मुनिराजों के ज्ञानावरणादि आठों कर्मों का नाश होने से उन्हें मुक्ति की प्राप्ति होती है । मूढचित्त अर्थात् मिथ्यादृष्टि भवाभिनन्दी जीवों का इस मुक्ति से अतिशय द्वेषभाव रहता है ।