
नास्ति येषामयं तत्र भवबीज-वियोगतः ।
तेऽपि धन्या महात्मानः कल्याण-फल-भागिनः ॥380॥
अन्वयार्थ : येषां भवबीज-वियोगत: तत्र अयं न अस्ति, ते महात्मान: अपि धन्या: च कल्याण-फल-भागिन: ।
जिनके जीवन में अनंत दुःख का कारणरूप भवबीज अर्थात् मिथ्यादर्शन का वियोग / अभाव होने से मुक्तिसंबंधी का द्वेषभाव नहीं रहा, वे महात्मा भी धन्य हैं, प्रशंसनीय हैं और वे कल्याणरूप फल के भागी हैं ।