
अन्तःशुद्धिं बिना बाह्या न साश्वासकरी मता ।
धवलोऽपि बको बाह्ये हन्ति मीनानेकशः ॥388॥
अन्वयार्थ : बक: बाह्ये धवल: अपि अनेकश: मीनान् हन्ति । तथा अन्त:शुद्धिं विना बाह्या साश्वासकरी न मता ।
जैसे बगुला बाह्य में धवल / उज्ज्वल होने पर भी अंतरंग अशुभ परिणामों से अनेक मछलियों को मारता ही रहता है; वैसे अन्तरंग की शुद्धि के बिना अर्थात् निश्चयधर्मरूप वीतरागता के अभाव में मात्र बाह्यशुद्धि अर्थात् मात्र २८ मूलगुणों के पालनरूप व्यवहारधर्म / द्रव्यलिंगपना विश्वास के योग्य नहीं है अर्थात् कुछ कार्यकारी नहीं है - संसारवर्धक ही है ।