
योगी षट्स्वपि कायेषु सप्रमादः प्रबध्यते ।
सरोजमिव तोयेषु निष्प्रमादो न लिप्यते ॥389॥
अन्वयार्थ : तोयेषु सरोजं इव योगी निष्प्रमाद: न लिप्यते । षट्सु अपि कायेषु सप्रमाद: प्रबध्यते ।
जिसप्रकार जल में कमल जल से सर्वथा अस्पर्शित रहता है अर्थात् जल का कमल से किंचित् भी स्पर्श नहीं होता; उसीप्रकार जो योगी प्रमाद से षट्काय जीवों की हिंसा में प्रवृत्त नहीं होते, वे ज्ञानावरणादि कर्मों से नहीं बंधते और जो प्रमाद से षट्काय जीवों की हिंसा में प्रवृत्त होते हैं, वे कर्मों से बंधते हैं ।