
साधुर्यतोऽगिंघातेऽपि कर्मभिर्बध्यते न वा ।
उपधिभ्यो ध्रुवो बन्धस्त्याज्यास्तैः सर्वथा ततः ॥390॥
अन्वयार्थ : अगिंघातेऽपि साधु: कर्मभि: बध्यते वा न । तु उपधिभ्य: ध्रुव: बन्ध: । तत: तै: सर्वथा त्याज्या: ।
आहार-विहारादि के समय मुनिराज के शरीर की क्रिया के निमित्त से और प्रमादरूप परिणाम के सद्भाव से अन्य जीव की हिंसा होने पर मुनिराज को कर्म का बंध होता है । और कभी कायचेष्टा के कारण जीव के घात होनेपर भी यदि प्रमादरूप परिणाम न हों तो कर्म का बंध नहीं होता; परंतु परिग्रह के कारण नियम से कर्म का बंध होता ही है । इसलिए मुनिराज परिग्रह का सर्वथा त्याग करते हैं ।