+ परिग्रहासक्त को आत्माराधना असंभव - -
आरम्भोऽसंयमो मूर्च्छा कथं तत्र निषिध्यते ।
परद्रव्यरतस्यास्ति स्वात्म-सिद्धिः कुतस्तनी ॥395॥
अन्वयार्थ : तत्र (पूर्वोक्त-स्थितौ) आरम्भ: असंयम: (तथा) मूर्च्छा कथं निषिध्यते ? पर-द्रव्य-रतस्य स्वात्म-सिद्धि: कुतस्तनी अस्ति ।
वस्त्र-पात्रादि की व्यवस्था करते हुए आरम्भ, असंयम तथा ममता का निषेध कैसे हो सकता है ? और इसतरह परद्रव्य में आसक्त साधु के स्वात्मसिद्धि कैसी ?