
न यत्र विद्यते च्छेदः कुर्वतो ग्रह-मोक्षणे ।
द्रव्यं क्षेत्रं परिज्ञाय साधुस्तत्र प्रवर्तताम् ॥396॥
अन्वयार्थ : द्रव्यं क्षेत्रं परिज्ञाय ग्रह-मोक्षणे कुर्वत: यत्र च्छेद: न विद्यते तत्र साधु: प्रवर्तताम् ।
द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव को भले प्रकार जानकर जिन बाह्य परिग्रह का ग्रहण-त्याग करते हुए साधु के दोष नहीं लगते, उनमें साधु को प्रवृत्त होना चाहिए ।