+ अग्राह्य परिग्रह का स्वरूप - -
संयमो हन्यते येन प्रार्थ्यते यदसंयतैः ।
येन संपद्यते मूर्च्छा तन्न ग्राह्यं हितोद्यतैः ॥397॥
अन्वयार्थ : हितोद्यतै: (साधुभि:) तत् न ग्राह्यं येन संयम: हन्यते, येन मूर्च्छा संपद्यते, (तथा) यत् असंयतै: प्रार्थ्यते ।
जो साधु अपनी हित की साधना में उद्यमी हैं, वे उन पदार्थों को ग्रहण नहीं करते, जिनसे उनकी संयम की हानि हो; ममत्व परिणाम की उत्पत्ति हो अथवा जो पदार्थ असंयमी के द्वारा प्रार्थित हो (जिन्हें असंयमी लोग निरंतर चाहते हैं)