
प्रमाद-मय-मूर्तीनां प्रमादोऽतो यतः सदा ।
प्रमदास्तास्ततः प्रोक्ताः प्रमाद-बहुलत्वतः ॥401॥
अन्वयार्थ : यत: प्रमाद-मय-मूर्तीनां सदा प्रमाद: , तत: प्रमाद-बहुलत्वत: ता: प्रमदा: प्रोक्ता: ।
क्योंकि प्रमादमय/प्रमादमूर्तिरूप स्त्रियों के सदा प्रमाद बना रहता है; अतः प्रमाद की बहुलता के कारण स्त्रियों को प्रमदा कहा गया है; इसलिए उन्हें मुक्ति की प्राप्ति नहीं होती ।