
विषादः प्रमदो मूर्च्छा जुगुप्सा मत्सरो भयम् ।
चित्ते चित्रायते माया ततस्तासां न निर्वृतिः ॥402॥
अन्वयार्थ : चित्ते विषाद: प्रमद: मूर्च्छा जुगुप्सा मत्सर: भयं तथा माया चित्रायते, तत: तासां निर्वृति: न ।
क्योंकि स्त्रियों के चित्त में प्रमद, विषाद, ममता, ग्लानि, ईर्ष्या, भय तथा माया चित्रित रहती है, इससे स्त्रियों को / स्त्री-पर्याय से मुक्ति नहीं होती ।