+ स्त्री-पर्याय में दिगंबरता का अभाव - -
शशंकामल-सम्यक्त्वाः समाचार-परायणाः ।
सचेलास्ताः स्थिता लिंगे तपस्यन्ति विशुद्धये ॥406॥
अन्वयार्थ : शशंकामल-सम्यक्त्वा: समाचार-परायणा: (च) ता: (स्त्रिय: अपि) लिंगे सचेला: स्थिता: विशुद्धये तपस्यन्ति ।
जो स्त्रियाँ चंद्रमा के समान निर्मल सम्यक्त्व से सहित हैं और आगम-कथित समीचीन आचरण में प्रवीण हैं, वे स्त्रियाँ भी सवस्त्ररूप से स्थित हुई आत्मशुद्धि के लिये तपश्चरण करती हैं । (दिगम्बरता का स्वीकार नहीं कर पाती)