
यो व्यावहारिको व्यंगे मतो रत्नत्रय-ग्रहे ।
न सोऽपि जायतेऽव्यंग: साधोः सल्लेखना-कृतौ ॥410॥
अन्वयार्थ : य: रत्नत्रय-ग्रहे व्यावहारिक: व्यंग: मत: स: अपि सल्लेखना-कृतौ साधो: अव्यंग: न जायते ।
मुनियोग्य रत्नत्रय की प्राप्ति के लिये जो व्यावहारिक व्यंग माने गये हैं, वे ही व्यंग कोई मनुष्य सल्लेखना के अवसर पर मुनि-अवस्था धारण करना चाहे तो उसके लिये भी वे व्यंग ही बने रहते हैं, अव्यंग नहीं हो जाते ।