+ श्रमण कौन होता है -
यस्येह लौकिकी नास्ति नापेक्षा पारलौकिकी ।
युक्ताहारविहारोऽसौ श्रमणः सममानसः ॥411॥
अन्वयार्थ : यस्य (महापुरुषस्य) इह न लौकिकी अपेक्षा अस्ति न पारलौकिकी; युक्ताहार-विहार: असौ (महापुरुष:) सममानस: श्रमण: (अस्ति)
जिस महामानव को इहलोक एवं परलोक संबंधी भोगादिक की अपेक्षा नहीं है अर्थात् जो भोगों से सर्वथा निरपेक्ष हैं, जो सर्वज्ञ कथित आगम के अनुसार योग्य आहार-विहार से सहित हैं और जो समचित्त के धारक/राग-द्वेष से रहित हैं अर्थात् अनंतानुबंधी आदि तीन कषाय चौकड़ी के अभावपूर्वक वीतराग परिणाम से परिणमित हैं, वे ही महापुरुष श्रमण हैं ।