+ चारित्र-आचरण में यथायोग्य दिशाबोध - -
बालो वृद्धस्तपोग्लानस्तीव्रव्याधि-निपीडितः ।
तथा चरतु चारित्रं मूलच्छेदो यथास्ति नो ॥421॥
अन्वयार्थ : बाल: वृद्ध:, तप: ग्लान: तीव्रव्याधि-निपीडित: (साधु:) तथा चारित्रं चरतु यथा मूलच्छेद: नो अस्ति ।
जो मुनिराज छोटी उमर के (बालक) हों, वृद्ध-अवस्था को प्राप्त हुए हों, दीर्घकाल से उपवासादिक अनुष्ठान करनेवाले तपस्वी हों, रोगादिक से जिनका शरीर कृश हुआ हों अथवा किसी तीव्र व्याधि से शरीर पीड़ित हों, उन्हें चारित्र का उसप्रकार से पालन करना चाहिए, जिससे मूलगुणों का विच्छेद अथवा चारित्र का मूलत: विनाश न होने पावे ।