
आगमे शाश्वती बुद्धिर्मुक्तिस्त्री-शंफली यतः ।
ततः सा यत्नतः कार्या भव्येन भवभीरुणा ॥432॥
अन्वयार्थ : यत: आगमे शाश्वती बुद्धि: मुक्तिस्त्री-शंफली । तत: भवभीरूणा भव्येन यत्नत: सा कार्या ।
शास्त्र के अध्ययन-मनन-चिंतन आदि में निरंतर संलग्न बुद्धि मुक्तिरूपी स्त्री की प्राप्ति के लिये दूती के समान काम करती है; इसलिए संसार अर्थात् राग-द्वेषादि परिणामों से उत्पन्न दुःख से भयभीत भव्य जीवों को अपनी बुद्धि को प्रयत्नपूर्वक शास्त्र में लगाना चाहिए ।