
भावेषु कर्मजातेषु मनो येषां निरुद्यमम् ।
भव-भोग-विरक्तास्ते भवातीताध्वगामिनः ॥443॥
अन्वयार्थ : कर्मजातेषु भावेषु येषां मन: निरुद्यमं । ते भव-भोग-विरक्ता: भवातीताध्वगामिन: ।
कर्मोदय से उत्पन्न परिणामों में तथा कर्मोदय से प्राप्त संयोगी बाह्य पदार्थों में जिन साधक जीवों का मन उद्यम रहित है, वे भव एवं भोगों से विरक्त साधक जीव भवातीतमार्गगामी हो जाते हैं ।