
विचित्रा देशनास्ततत्र भव्यचित्तानुरोधतः ।
कुर्वन्ति सूरयो वैद्या यथाव्याध्यनुरोधतः ॥450॥
अन्वयार्थ : यथा व्याधि-अनुरोधत: वैद्या: विचित्रा: देशना: कुर्वन्ति सूरय: भव्यचित्तानुरोधत: तत्र सूरय: विचित्रा: देशना: ।
जिस समय जिस रोगी की जिसप्रकार की व्याधि/बीमारी होती है; उस समय चतुर वैद्य उस व्याधि तथा रोगी की प्रकृति आदि के अनुरूप योग्य भिन्न-भिन्न औषधि की योजना करते हैं; उसीप्रकार मुक्तिमार्ग के संबंध में भी आचार्य महोदय भव्य जीवों के चित्तानुरोध से नाना प्रकार की देशनाएँ देते हैं ।