
कारणं निर्वृतेरेतच्चारित्रं व्यवहारतः ।
विविक्तचेतनध्यानं जायते परमार्थतः ॥451॥
अन्वयार्थ : एतत् चारित्रं व्यवहारत: निर्वृते: कारणं । परमार्थत: विविक्त-चेतन-ध्यानं जायते ।
इस चारित्र अधिकार में २८ मूलगुणों की मुख्यता से कहा हुआ चारित्र व्यवहारनय से निर्वाण / मुक्ति का कारण है । निश्चयनय से कर्मरूपी कलंक से रहित निज शुद्धात्मा का ध्यान ही निर्वाण का कारण है ।