
चारित्रं चरतः साधोः कषायेन्द्रिय-निर्जयः ।
स्वाध्यायोऽतस्ततो ध्यानं ततो निर्वाणसंगमः ॥454॥
अन्वयार्थ : चारित्रं चरत: साधो: कषायेन्द्रिय-निर्जय: । अत: स्वाध्याय: । तत: ध्यानं तत: निर्वाणसंगम: ।
जिनेंद्र-कथित २८ मूलगुणरूप व्यवहार चारित्र का यथार्थ आचरण करने से क्रोधादि कषायों का एवं स्पर्शनेंद्रियादि इंद्रियों का जीतना होता है । इनको जीतने से शास्त्र का स्वाध्याय/निजात्मा का ज्ञान तथा अनुभव होता है । इस कारण आत्मध्यान होता है । आत्म-ध्यान से मुक्ति की प्राप्ति होती है ।