
निर्वृतेरनुकूलोऽध्वा चारित्रं जिन-भाषितम् ।
संसृतेरनुकूलोऽध्वा चारित्रं पर-भाषितम् ॥453॥
अन्वयार्थ : जिन-भाषितं चारित्रं निर्वृते: अनुकूल: अध्वा । पर-भाषितं चारित्रं संसृते: अनुकूल: अध्वा ।
वीतराग-सर्वज्ञ भगवान द्वारा कहा गया २८ मूलगुणरूप चारित्र, वह मोक्ष के लिये अनुकूल मार्ग है और वीतराग तथा सर्वज्ञता से रहित किसी अन्य वक्ता द्वारा कहा गया चारित्र, वह संसार के लिये अनुकूल मार्ग है ।