
ध्यानं विनिर्मलज्ञानं पुंसां संपद्यते स्थिरम् ।
हें क्षीणमलं किं न कल्याणत्वं प्रपद्यते ॥470॥
अन्वयार्थ : पुंसां विनिर्मलज्ञानं स्थिरं ध्यानं संपद्यते । क्षीणमलं हें किं कल्याणत्वं न प्रपद्यते ? ।
पुरुषों का अर्थात् जीवों का निर्मल/सम्यग्ज्ञान जब स्थिर होता है, तब उस ज्ञान को ही ध्यान कहते हैं । यह ठीक ही है, क्योंकि किट्ट-कालिमादिरूप मल से रहित हुआ सुवर्ण क्या कल्याणपने को प्राप्त नहीं होता?