+ भोग एवं आत्मज्ञान का स्वरूप - -
ततः पुण्यभवा भोगा दुःखं परवशत्वतः ।
सुखं योगभवं ज्ञानं स्वरूपं स्ववशत्वतः ॥469॥
अन्वयार्थ : तत: पुण्यभवा: भोगा: परवशत्वत: दु:खं (भवति) । योगभवं ज्ञानं स्ववशत्वत: सुखं स्वरूपं (भवति)
जो जो पराधीन है वह सब दुःख है । इसलिए पुण्य से उत्पन्न हुए जो जो भोग हैं, वे सब परवश / पराधीन होने से दुःखरूप हैं । योग अर्थात् ध्यान से उत्पन्न हुआ जो निज शुद्ध आत्मा का ज्ञान है, वह स्वाधीन होने से सुखरूप एवं अपने आत्मा का स्वरूप है ।