+ तत्त्वदृष्टिहीन जीव का स्वरूप - -
स तिष्ठति भयोद्विग्नो यथा तत्रैव शंकित: ।
तथा निर्वृतिमार्गेऽपि भोगमायाविमोहितः ॥480॥
अन्वयार्थ : यथा (मायाजले) शंकित: भय-उद्विग्न: स: (जीव:) तत्र (मायाजले) एव तिष्ठति; तथा भोगमायाविमोहित: (जीव:) अपि निर्वृतिमार्गे (शंकित: प्रवर्तति)
जिसप्रकार मृगमरीचिका अर्थात् मायाजल में जिसे असत्यपने का निर्णय नहीं है; ऐसा मनुष्य भय से सदा दुःखी रहता है; उसीप्रकार पंचेंद्रियों के भोगों में दुःख ही है, ऐसा निर्णय मोह से जिसे नहीं है, वह जीव मोक्षमार्ग में शंकित हुआ वर्तता है ।