
धर्मतोऽपि भवो भोगो दत्ते दुःख-परंपराम् ।
चन्दनादपि संपन्नः पावकः प्लोषते न किम् ॥481॥
अन्वयार्थ : चन्दनात् अपि सम्पन्न: पावक: किं न प्लोषते ? धर्मत: अपि भव: भोग: दु:ख-परंपरां दत्ते ।
जिसप्रकार शीतलस्वभावी चंदन से भी उत्पन्न हुई अग्नि जलाने का ही काम करती है; उसीप्रकार पुण्यरूप व्यवहार धर्म से प्राप्त हुआ सहज भोग भी जीव को दुःख की परम्परा को ही देता है ।