+ सच्चा वैराग्य का स्वरूप - -
भोग-संसार-निर्वेदो जायते पारमार्थिकः ।
सम्यग्ज्ञान-प्रदीपेन तन्नैर्गुण्यावलोकने ॥483॥
अन्वयार्थ : सम्यग्ज्ञान-प्रदीपेन तत्-नैर्गुण्यावलोकने (कृते) भोग-संसार-निर्वेद: पारमार्थिक: जायते ।
जब सम्यग्ज्ञानरूप दीपक से पंचेंद्रियों के रम्य भोग और आकर्षक लगनेवाले राग-द्वेषरूप संसारवर्धक परिणामों में निर्गुणता अर्थात् निरर्थकता/व्यर्थता भलीभाँति समझ में आती है, तब भोग और संसार से वास्तविक/सच्चा वैराग्य होता है ।