+ सच्चे त्याग का स्वरूप - -
ज्ञानवन्तः सदा बाह्यप्रत्याख्यान-विशारदाः ।
ततस्तस्य परित्यागं कुर्वते परमार्थतः ॥485॥
अन्वयार्थ : तत: बाह्यप्रत्याख्यान-विशारदा: ज्ञानवन्त: परमार्थत: तस्य (विपर्यय-ज्ञानस्य) सदा परित्यागं कुर्वते ।
इसकारण बाह्य पदार्थों के त्याग में प्रवीण अर्थात् सम्यग्ज्ञान के धारक साधक मिथ्यात्व का वास्तविकरूप से त्याग करते हैं ।