+ मुमुक्षुओं का स्वरूप - -
न कुत्राप्याग्रहस्तत्त्वे विधातव्यो मुमुक्षुभिः ।
निर्वाणं साध्यते यस्मात् समस्ताग्रहवर्जितैः ॥490॥
अन्वयार्थ : मुमुक्षुभि: कुत्र अपि तत्त्वे आग्रह: न विधातव्य:; यस्मात् समस्त-आग्रहवि र्जतै: निर्वाणं साध्यते ।
जो मोक्ष के अभिलाषी / इच्छुक जीव हैं, उन्हें अन्य किसी भी तत्त्व का अर्थात् व्यवहार धर्म के साधन / निमित्तरूप पुण्यपरिणामों का अथवा शुभ क्रियाओं का आग्रह / हठ नहीं रखना चाहिए; क्योंकि जो समस्त प्रकार के आग्रहों से / एकांत अभिनिवेशों से रहित हो जाते हैं अर्थात् मध्यस्थ / सहज रहते हैं वे ही सिद्धपद को प्राप्त करते हैं ।