
कर्ताहं निर्वृतिः कृत्यं ज्ञानं हेतुः सुखं फलम् ।
नैकोऽपि विद्यते तत्र विकल्पः कल्पनातिगे ॥491॥
अन्वयार्थ : अहं कर्ता, निर्वृति: कृत्यं, ज्ञानं हेतु: सुखं फलम् एक: अपि विकल्प: तत्र कल्पनातिगे न विद्यते ।
मैं कर्ता हूँ, मुक्ति प्राप्त करना मेरा कर्त्तव्य है, निर्वाणरूप कार्य के लिये ज्ञान कारण है और ज्ञान का फल सुख है - इत्यादि में से एक भी विकल्प उस कल्पनातीत/अलौकिक मुमुक्षु में नहीं होता है ।