
आत्म-व्यवस्थिता यान्ति नात्मत्वं कर्मवर्गणाः ।
व्योरूपत्वमायान्ति व्योस्थाः किमु पुद्गलाः ॥492॥
अन्वयार्थ : व्योस्था: पुद्गला: किमु व्योरूपत्वं आयान्ति ? आत्म-व्यवस्थिता: कर्मवर्गणा: आत्मत्वं न यान्ति ।
विशाल लोकाकाश में व्याप्त अनंतानंत स्थूल तथा सूक्ष्म पुद्गल क्या कभी आकाश-द्रव्यरूप परिणमित हो सकते हैं? नहीं, कदापि नहीं । आकाश, आकाशरूप रहता है और पुद्गल पुद्गलद्रव्यरूप ही रहते हैं । उसीप्रकार संसारी आत्मा के प्रदेशों में खचाखच / ठसाठस भरी हुई ज्ञानावरणादि आठ कर्मरूप परिणमित कार्माणवर्गणाएँ आत्मतत्त्व/चेतनपने को प्राप्त नहीं हो सकती, वे सब कार्माणवर्गणाएँ पुद्गलरूप ही रहती हैं और आत्मा भी आत्मद्रव्यरूप ही रहता है ।