
कालुष्याभावतोऽकर्म कालुष्यं कर्मतः पुनः ।
एकनाशे द्वयोर्नाशः स्याद् बीजांकुरयोरिव ॥497॥
अन्वयार्थ : कर्मत: कालुष्यं , पुन: कालुष्य-अभावत: अकर्म । बीज-अंकुरयो: इव एकनाशे द्वयो: नाश: स्यात् ।
मोहनीय कर्म के उदय के निमित्त से जीव में क्रोधादिरूप कलुषता की उत्पत्ति होती है और क्रोधादिरूप कलुषता के अभाव से ज्ञानावरणादि कर्म का अभाव होता है । बीज और अंकुर की तरह दोनों में से किसी एक का नाश होने पर दोनों का एकसाथ नाश हो जाता है ।