
यदास्ति कल्मषाभावो जीवस्य परिणामिनः ।
परिणामास्तदा शुद्धाः स्वर्णस्येवोत्तरोत्तराः ॥498॥
अन्वयार्थ : यदा परिणामिन: जीवस्य कल्मषाभाव: अस्ति, तदा परिणामा: सुवर्णस्य इव उत्तरोत्तरा: शुद्धा: ।
जिस समय परिणमनस्वभावी संसारी साधक जीव के मोह-राग-द्वेषरूप कलुषता का यथागुणस्थान अभाव हो जाता है, उस समय उस जीव के वीतरागरूप धर्मपरिणाम उत्तरोत्तर सुवर्ण के समान शुद्ध होते चले जाते हैं ।