
सर्वे भावाःस्वभावेन स्वस्वभाव-व्यवस्थिताः ।
न शक्यन्तेऽन्यथा कर्तुं ते परेण कदाचन ॥502॥
अन्वयार्थ : सर्वे भावा: स्वभावेन स्वस्वभाव-व्यवस्थिता: , ते परेण कदाचन अन्यथा कर्तुं न शक्यन्ते ।
सब द्रव्य स्वभाव से अपने-अपने स्वभाव अर्थात् स्वरूप में सदा स्थित रहते हैं; वे सभी द्रव्य पर के द्वारा कभी अन्यथारूप नहीं किये जा सकते ।