
युज्यते रजसा नात्मा भूयोऽपि विरजीकृतः ।
पृथक्कृतं कुतः स्वर्णं पुनः किट्टेन युज्यते ॥509॥
अन्वयार्थ : किट्टेन पृथक्कृतं स्वर्णं पुन: कुत: युज्यते ? रजसा विरजीकृत: आत्मा अपि भूय: न युज्यते ।
जिसप्रकार किट्ट कालिमारूप मल से भिन्न किया गया शुद्ध सुवर्ण फिर से किट्ट कालिमा से युक्त होकर अशुद्ध नहीं हो सकता; उसीप्रकार जो ज्ञानावरणादि आठों कर्मरूपी रज से रहित हुआ है, वह शुद्ध आत्मा भी फिर से कर्मों से युक्त नहीं होता अर्थात् बंधता नहीं है ।