
दण्ड-चक्र-कुलालादि-सामग्रीसम्भवेऽपि नो ।
संपद्यते यथा कुम्भो विनोपादानकारणम् ॥510॥
मनो-वचो-वपुःकर्म-सामग्रीसम्भवेऽपि नो ।
संपद्यते तथा कर्म विनोपादानकारणम् ॥511॥
अन्वयार्थ : यथा दण्ड-चक्र-कुलालादि-सामग्रीसम्भवे अपि उपादानकारणं विना कुम्भ: नो सम्पद्यते । तथा मनःवचःवपुःकर्म-सामग्रीसम्भवे अपि उपादानकारणं विना कर्म न सम्पद्यते ।
जिसप्रकार दण्ड, चक्र और कुंभकार आदि निमित्तरूप अनेक प्रकार की कारण सामग्री का सद्भाव होनेपर भी मृत्पिण्डरूप उपादान कारण के बिना कुम्भ/घटरूप कार्य की उत्पत्ति नहीं होती । उसीप्रकार मन-वचन-काय की क्रियारूप निमित्तकारण स्वरूप सामग्री का सद्भाव / अस्तित्व होने पर भी मिथ्यात्व, अविरति आदि कलुषतारूप उपादान कारण के बिना कर्म की उत्पत्ति नहीं होती ।