
यथा कुम्भमयो जातु कुम्भकारो न जायते ।
सहकारितया कुम्भं कुर्वाणोऽपि कथंचन ॥513॥
कषायादिमयो जीवो जायते न कदाचन ।
कुर्वाणोऽपि कषायादीन् सहकारितया तथा ॥514॥
अन्वयार्थ : यथा सहकारितया कुम्भं कुर्वाण: अपि कुम्भकार: कथंचन कुम्भमय: जातु न जायते; तथा सहकारितया कषायादीन् कुर्वाण: अपि जीव: कदाचन कषायादिमय: न जायते ।
जिसप्रकार सहकारिता के रूप में अर्थात् निमित्त की अपेक्षा से कुंभ को करता हुआ कुंभकार कभी कुंभरूप नहीं होता, कुंभकार ही रहता है । उसीप्रकार सहकारिता के रूप में अर्थात् निमित्त की अपेक्षा से क्रोधादि कषायें करता हुआ भी यह जीव कभी क्रोधादि कषायरूप नहीं होता, जीव ही रहता है ।