
यः कर्म मन्यते कर्माकर्म वाकर्म सर्वथा ।
स सर्वकर्मणां कर्ता निराकर्ता च जायते ॥515॥
अन्वयार्थ : य: कर्म सर्वथा कर्म मन्यते वा अकर्म अकर्म ; स: सर्वकर्मणां कर्ता निराकर्ता च जायते ।
जो कर्म को सर्वथा कर्म के रूप में और अकर्म को सर्वथा अकर्म के रूप में मानता है, वह सर्व कर्मों का कर्ता होते हुए भी उन कर्मों का निराकर्ता अर्थात् अकर्ता होता है ।