
ततः शुभाशुभौ हित्वा शुद्धं भावमधिष्ठितः ।
निर्वृतो जायते योगी कर्मागमनिवर्तकः ॥519॥
अन्वयार्थ : तत: कर्मागमनिवर्तक: योगी शुभाशुभौ हित्वा शुद्धं भावं अधिष्ठित: निर्वृत: जायते ।
इस कारण जो योगी कर्मों के आस्रव का निरोधक है, वह शुभ-अशुभ भावों को छोड़कर शुद्धभाव / वीतराग भाव में अधिष्ठित अर्थात् विराजमान होता हुआ मुक्ति को प्राप्त होता है ।