
विनिवृत्यार्थतश्चित्तं विधायात्मनि निश्चलम् ।
न किञ्चिच्चिन्तयेद्योगी निरस्ताखिलकल्मषः ॥520॥
अन्वयार्थ : निरस्ताखिलकल्मष: योगी चित्तं अर्थत: विनिवृत्य आत्मनि निश्चलं विधाय न किञ्चित् चिन्तयेत् ।
जिस योगी ने मिथ्यात्व, क्रोधादि कषायरूप कल्मष का पूर्ण नाश किया है, वह चित्त को सब ज्ञेयरूप पदार्थों से हटाकर मात्र निज भगवान आत्मा में निश्चल/स्थिर करता है, आत्मा को छोड़कर किसी का किंचित भी चिंतन/ध्यान नहीं करता । -