
भोगं कश्चिदभुञ्जानो भोगार्थं कुरुते क्रियाम् ।
भोगमन्यस्तु भुञ्जानाे भोगच्छेदाय शुद्धधीः ॥522॥
अन्वयार्थ : कश्चित् भोगं अभुञ्जान: भोगार्थं क्रियां कुरुते, अन्य: शुद्धधी: तु भोगं भुञ्जान: भोगच्छेदाय ।
कोई अज्ञानी पूर्वबद्ध पापोदय के कारण भोग्यवस्तु प्राप्त न होने से भोग को प्रत्यक्ष में न भोगता हुआ भी पंचेंद्रियों के भोग भोगने के लिये क्रिया अर्थात् प्रयास करता है । दूसरा कोई शुद्धबुद्धिधारक तत्त्वज्ञानी अपने पूर्वबद्ध पुण्योदय से प्राप्त पंचेन्द्रिय-भोगों को अनासक्त बुद्धि से भोगता हुआ भी संसार के छेद का प्रयत्न करता है ।