
स्वार्थ-व्यावर्तिताक्षोऽपि विषयेषु दृढ-स्मृति: ।
सदास्ति दुःस्थितो दीनो लोक-द्वय-विलोपकः ॥521॥
अन्वयार्थ : स्वार्थ-व्यावर्तिताक्षः अपि विषयेषु दृढ-स्मृति: सदा दु:स्थित:, दीन: लोक-द्वय-विलोपक: अस्ति ।
जो जीव अपने स्पर्शनेंद्रियादि को उनके स्पर्शादि विषयों से अलग रखता है अर्थात् प्रत्यक्ष में इंद्रियों से विषयों को भोगता नहीं है; तथापि इंद्रियों के विषयों का बराबर सतत स्मरण करता रहता है, वह अज्ञानी सदा दुःखी एवं दीन रहता है और अपने इस जन्म को तथा अगले भवों को भी बिगाड़ता है ।