+ भोग के सन्दर्भ में रागी एवं विरागी का स्वरूप - -
रागी भोगमभुञ्जानो बध्यते कर्मभिः स्फुट् ।
विरागः कर्मभिर्भोगं भुञ्जानोऽपि न बध्यते ॥524॥
अन्वयार्थ : रागी भोगं अभुञ्जान: (अपि) कर्मभि: बध्यते; (च) विराग: भोगं भुञ्जान: अपि कर्मभि: न बध्यते (एतत् तु) स्फुटं (अस्ति)
जो मिथ्यात्व-अनंतानुबंधी सहित रागी जीव है वह अज्ञानी भोग को न भोगता हुआ भी सदा ज्ञानावरणादि आठों कर्मों से बंधता है और जो मिथ्यात्व-अनंतानुबंधी कषाय रहित किंचित् / अल्प वीतरागी है, वह ज्ञानी श्रावक भोग को भोगता हुआ भी ज्ञानावरणादि आठों कर्मों से नहीं बंधता, यह सुनिश्चित है ।