
विषयं पञ्चधा ज्ञानी बुध्यमानो न बध्यते ।
त्रिलोकं केवली किं न जानानो बध्यतेऽन्यथा ॥525॥
अन्वयार्थ : ज्ञानी पञ्चधा विषयं बुध्यमान: न बध्यते, अन्यथा त्रिलोकं जानान: केवली किं न बध्यते?
ज्ञानी पाँच प्रकार के इन्द्रिय विषयों को जानते हुए भी कर्मबन्ध को प्राप्त नहीं होते । तीन लोक को जाननेवाले केवली भगवान क्या बन्ध को प्राप्त नहीं होंगे? ।