
राग-द्वेष-निवृत्तस्य प्रत्याख्यानादिकं वृथा ।
राग-द्वेष-प्रवृत्तस्य प्रत्याख्यानादिकं वृथा ॥527॥
अन्वयार्थ : राग-द्वेष-निवृत्तस्य प्रत्याख्यानादिकं वृथा । च रागद्वेष-प्रवृत्तस्य प्रत्याख्यानादिकं वृथा ।
जो साधक मुनिराज राग-द्वेष से रहित हैं, उनके प्रत्याख्यानादिक षट्कर्म व्यर्थ अर्थात् कुछ काम के नहीं हैं और जो मुनिराज राग-द्वेषादि विभाव भावों में प्रवृत्त हैं, उनके भी प्रत्याख्यानादिक षट्कर्म व्यर्थ अर्थात् कुछ काम के नहीं है ।