
विमूढो नूनमक्षार्थगृह्णानोऽपि बध्यते ।
एकाक्षाद्या निबध्यन्ते विषयाग्रहिणो न किम् ॥526॥
अन्वयार्थ : विमूढ: नूनं अक्षार्थं अगृह्णान: अपि बध्यते; एकाक्षाद्या: विषय-अग्रहिण: किं न निबध्यन्ते? ।
विमूढ़ अर्थात् मिथ्यादृष्टि महाअज्ञानी जीव निश्चय से इंद्रिय-विषयों को ग्रहण न करते हुए भी ज्ञानावरणादि कर्मबंध को प्राप्त होते हैं । क्या एकेंद्रियादि जीव रसादि चार विषयों को ग्रहण न करते हुए भी ज्ञानावरणादि आठों कर्मों के बंध को प्राप्त नहीं होते हैं?