
रागिणः सर्वदा दोषाः सन्ति संसारहेतवः ।
ज्ञानिनो वीतरागस्य न कदाचन ते पुनः ॥529॥
अन्वयार्थ : रागिण: संसारहेतव: दोषा: सर्वदा सन्ति, पुन: ज्ञानिन: वीतरागस्य ते कदाचन न ।
रागी अर्थात् मिथ्यादृष्टि जीव के संसार के कारणभूत सर्व दोष सदाकाल होते हैं; परन्तु ज्ञानी वीतरागी जीव के संसार के कारणभूत सर्व दोष कदाचित् भी नहीं होते ।