+ कर्मबंध एवं मुक्ति का कारणरूप भाव - -
जीवस्यौदयिको भावः समस्तो बन्धकारणम् ।
विमुक्तिकारणं भावो जायते पारिणामिकः ॥530॥
अन्वयार्थ : जीवस्य औदयिक: भाव: समस्त: बन्धकारणं (भवति, जीवस्य च) पारिणामिक: भाव: विमुक्तिकारणं जायते ।
मोहनीय कर्मों के उदय के निमित्त से उत्पन्न होनेवाले जीव के जो औदयिक भाव हैं वे सब नवीन कर्मबंध के कारण होते हैं और जीव का जो पारिणामिक भाव है, वह मुक्ति का कारण होता है ।