+ दोनों संसारच्छेद में तुलना - -
देशच्छेदे चरित्रं भवति भवततेः कुर्वतश्चित्ररूपं ।
मूलच्छेदे विविक्तं वियदिव विमलं ध्यायति स्वस्वरूपम् । ।
विज्ञायेत्थं विचिन्त्यं सदमितगतिभिस्तत्त्वमन्तःस्थमग्र्यं ।
संप्राप्तासन्नमार्गा न परमिह पदप्राप्तये यान्ति मार्ग् ॥537॥
अन्वयार्थ : (संसारस्य) देशच्छेदे (सति) भवतते: चित्ररूपं कुर्वत: चरित्रं भवति (संसारस्य च) मूलच्छेदे (आत्मा) वियत् इव विमलं, विविक्तं स्व-स्वरूपं ध्यायति । इत्थं विज्ञाय सदमितगतिभि: अन्त:स्थं अग्र्यं तत्त्वं विचिन्त्यं (अस्ति) । संप्राप्तासन्नमार्गा: पदप्राप्तये परं मार्गं इह न यान्ति (इव)
संसार के एकदेश छेद/नाश होने पर अर्थात् अति पापरूप अवस्था का अभाव होने से संसार की परम्परानुसार चित्र-विचित्ररूप अर्थात् अनेक अवस्थाओं को धारण करनेरूप चारित्र होता है । मिथ्यात्व के अभावपूर्वक संसार के मूल का नाश होने पर आत्मा आकाश के समान कर्मरूपी कलंक से रहित निर्मल अपने निज स्वरूप को ध्याता है । इसप्रकार वस्तुस्वरूप को यथार्थ जानकर जो उत्तम ज्ञान के धारक महापुरुष हैं, वे अंतरंग में स्थित प्रधान तत्त्वरूप शुद्ध आत्मा का ही ध्यान करते हैं । यह योग्य ही है कि जिन्हें अपेक्षित / इष्ट स्थान की प्राप्ति का उपाय अपने निकट / अपने में ही प्राप्त होता है, तो वे फिर दूर के अन्यथा मार्ग से गमन नहीं करते ।