
राजवार्तिक :
1. गुण का प्रकरण है अतः अधिकौ का अर्थ अधिक गुणवाले होता है। 2. अवस्थान्तर उत्पन्न करना पारिणामकता है। जैसे अधिक मधुरगुणवाला गुड धूलि आदि को मीठे रसवाला बनाने के कारण पारिणामक होता है उसी तरह अन्य भी अधिक गुणवाला न्यून गुणवालों का पारिणामक होता है। तात्पर्य यह कि दो-गुणस्निग्ध परमाणु को चार-गुण रूक्षपरमाणु पारिणामक होता है। बन्ध होने पर एक तीसरी ही विलक्षण अवस्था होकर एक स्कन्ध बन जाता है। अन्यथा सफेद और काले धागों के संयोग होने पर भी दोनों जुदे-जुदे से रखे रहेंगे । जहाँ पारिणामकता होती है वहाँ स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण आदि में परिवर्तन हो जाता है जैसे शुक्ल और पीत रंगों के मिलने पर हरे रंग के पत्र आदि उत्पन्न होते हैं। 3-4. श्वेताम्बर परम्परामें 'बन्धे समाधिको' पाठ है । इसका तात्पर्य है कि द्वि-गुणस्निग्ध का द्वि-गुणरूक्ष भी पारिणामक होता है। पर यह पाठ उपयुक्त नहीं है। क्योंकि इसमें सिद्धान्तविरोध होता है। वर्गणा में बन्ध विधान के नोआगम द्रव्यबन्ध विकल्प-सादि वैस्रसिक बन्धनिर्देश में कहा है कि - 'विषम स्निग्धता और विषमरूक्षता में बन्ध तथा समस्निग्धता और समरूक्षता में भेद होता है।' इसी के अनुसार 'गुणसाम्ये सदृशानाम्' यह सूत्र कहा गया है। इससे समगुणवालों के बन्ध का जब प्रतिषेध कर दिया तब बन्ध में 'सम' भी पारिणामक होता है यह कथन आर्षविरोधी है । अतः विद्वानों के द्वारा ग्राह्य नहीं है। 5. 'जघन्यवर्जे विषमे समे वा' का तात्पर्य यह है कि - सम अर्थात् तुल्यजातीय और विषम अर्थात् अतुल्यजातीय । अतः सम-चतुर्गुण स्निग्ध का षड्गुण स्निग्ध के साथ और और विषम-चतुर्गुणस्निग्ध का षड्गुण रूक्ष के साथ बन्ध होता है। बन्ध की इतनी लम्बी चर्चा करने का प्रयोजन यह है कि - आत्मा के योगव्यापार से आत्मा के प्रदेशों में स्निग्धरूक्ष परिणत अनन्तप्रदेशी कर्म बन्ध को प्राप्त होते हैं। ये ज्ञानावरणादि कर्म अपनी तीस कोड़ाकोड़ी सागर आदि तक की स्थिति तक घनपरिणामी बन्ध को प्राप्त रहते हैं, विघटित नहीं होते। आपने 'द्रव्याणि, जीवाश्च' इन सूत्रो में 'द्रव्य'का नामनिर्देश तो किया है, लक्षण नहीं बताया । अतः द्रव्य का लक्षण कहते हैं -- |