+ द्रव्य का और लक्षण -
गुण-पर्ययवद् द्रव्यम् ॥38॥
अन्वयार्थ : गुण और पर्यायवाला द्रव्‍य है॥३८॥
Meaning : That which has qualities and modes is a substance.

  सर्वार्थसिद्धि    राजवार्तिक 

सर्वार्थसिद्धि :

जिसमें गुण और पर्याय दोनों हैं वह गुण-पर्यायवाला कहलाता है और वही द्रव्‍य है। यहाँ 'मतुप्' प्रत्‍यय का प्रयोग कैसे बनता है इस विषयमें पहले समाधान कर आये हैं। तात्‍पर्य यह है कि द्रव्‍य का गुण और पर्यायों से कथंचित् भेद है इसलिए यहाँ 'मतुप्' प्रत्‍यय का प्रयोग बन जाता है।

शंका – गुण किन्‍हें कहते हैं और पर्याय किन्‍हें कहते हैं ?

समाधान –
गुण अन्‍वयी होते हैं और पर्याय व्‍यतिरेकी। तथा इन दोनों से युक्त द्रव्य होता है। कहा भी है – 'द्रव्‍य में भेद करनेवाले धर्म को गुण और द्रव्‍य के विकार को पर्याय कहते हैं। द्रव्‍य इन दोनों से युक्त होता है। तथा वह अयुतसिद्ध और नित्‍य होता है।' तात्‍पर्य यह है कि जिससे एक द्रव्‍य दूसरे द्रव्‍य से जुदा होता है वह गुण है। इसी गुण के द्वारा उस द्रव्‍य का अस्तित्‍व सिद्ध होता है। यदि भेदक गुण न हो तो द्रव्‍यों में सांकर्य हो जाय। खुलासा इस प्रकार है –

जीव द्रव्‍य पुद्गलादिक द्रव्‍यों से ज्ञानादि गुणों के द्वारा भेद को प्राप्‍त होता है और पुद्गलादिक द्रव्‍य भी अपने रूपादि गुणों के द्वारा भेद को प्राप्‍त होते हैं। यदि ज्ञानादि गुणों के कारण विशेषता न मानी जाय तो सांकर्य प्राप्‍त होता है। इसलिए सामान्‍य की अपेक्षा जो अन्‍वयी ज्ञानादि हैं वे जीव के गुण हैं और रूपादिक पुद्गलादिक के गुण हैं। तथा इनके विकार विशेष रूप से भेद को प्राप्‍त होते हैं इसलिए वे पर्याय कहलाते हैं। जैसे घटज्ञान, पटज्ञान, क्रोध, मान, गन्‍ध, वर्ण, तीव्र और मन्‍द आदिक। तथा जो इनसे कथंचित् भिन्‍न है और समुदाय रूप है वह द्रव्‍य कहलाता है। यदि समुदाय को सर्वथा अभिन्‍न मान लिया जाय तो सबका अभाव प्राप्‍त होता है। खुलासा इस प्रकार है – परस्‍पर विलक्षण धर्मों का समुदाय होने पर यदि उसे एक और अभिन्‍न माना जाय तो समुदाय का और सबका अभाव प्राप्‍त होता है, क्‍योंकि वे धर्म परस्‍पर भिन्‍न हैं। जो यह रूप है उससे रसादिक भिन्‍न हैं। अब यदि इनका समुदाय अभिन्‍न माना जाता है तो रसादिक से भिन्‍न जो रूप है और उससे अभिन्‍न जो समुदाय है वह रसादिक से भिन्‍न कैसे नहीं होगा अर्थात् अवश्‍य होगा। और इस प्रकार समुदाय रूपमात्र प्राप्‍त होता है। परन्‍तु एक रूप गुण समुदाय हो नहीं सकता इसलिए समुदाय का अभाव प्राप्‍त होता है और समुदाय का अभाव हो जाने से उससे अभिन्‍न समुदायियों का भी अभाव होता है। इस प्रकार समुदाय और समुदायी सबका अभाव हो जाता है। जिस प्रकार रूप की अपेक्षा कथन किया उसी प्रकार रसादिक की अपेक्षा भी कथन करना चाहिए। इसलिए यदि समुदाय स्‍वीकार किया जाता है तो वह कथंचित् अभिन्‍न ही मानना चाहिए।



पूर्वोक्त द्रव्‍यों के लक्षण का निर्देश करने से यह प्राप्‍त हुआ कि जो उस लक्षण का विषय है वही द्रव्‍य है, अत: अभी तक जिस द्रव्‍य का कथन नहीं किया उसकी सूचना करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं–
राजवार्तिक :

1. यद्यपि गुण और पर्याय द्रव्य से अभिन्न हैं, फिर भी 'गुणपर्ययवत्' यहाँ मत्वर्थीय प्रत्यय हो जाता है जैसे कि 'सोने की अंगूठी' में सोना और अँगूठी में अभेद होने पर भी भेदप्रयोग देखा जाता है । अथवा, लक्षण आदि की दृष्टि से गुणपर्यायों का द्रव्य से कथंचित, भेद भी है, अतः मत्वीय प्रयोग बन जाता है।

2. प्रश्न – 'गुण' यह संज्ञा जैनमत की नहीं है, यह तो अन्यमत वालों की है। जैनमत में तो द्रव्य और पर्याय ये दो ही प्रसिद्ध हैं । द्रव्यार्थिक और पर्यायाथिक दो नामों का उपदेश होने से भी ज्ञात होता है कि द्रव्य और पर्याय ये दो ही हैं, गुण नहीं । यदि गुण होता तो उसको विषय करनेवाला तीसरा गुणार्थिकनय भी होना चाहिए था। अतः 'गुणपर्यायवत्' यह लक्षण ठीक नहीं है ?

उत्तर –
अर्हत्प्रवचनहृदय आदिमें 'गुण' का उपदेश है। अर्हत्प्रवचन में 'द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' इस सूत्र में गुण का निर्देश है ही। अन्यत्र भी कहा है -

'गुण' यह द्रव्य का विधान-अन्वय अंश है। द्रव्य के विकार को पर्याय कहते हैं। द्रव्य इनसे सदा अयुतसिद्ध है।'

द्रव्य के सामान्य और विशेष ये दो स्वरूप हैं। सामान्य, उत्सर्ग, अन्वय और गुण ये एकार्थक शब्द हैं । विशेष भेद और पर्याय ये पर्यायार्थक शब्द हैं। सामान्य को विषय करनेवाला द्रव्यार्थिकनय है और विशेष को विषय करनेवाला पर्यायार्थिक । दोनों समुदित अयुतसिद्धरूप द्रव्य हैं। अतः गुण जब द्रव्य का ही सामान्यरूप है तब उसके ग्रहण के लिए द्रव्यार्थिक से पृथक् गुणार्थिक नय की कोई आवश्यकता नहीं है। समुदायरूप द्रव्य सकलादेशी प्रमाण का विषय होता है।

3-4. अथवा, गुणा एव पर्याया' ऐसा समानाधिकरणरूप से निर्देश करेंगे। अर्थात् उत्पाद, व्यय और घौव्य पर्याय नहीं है और न इनसे भिन्न गुण हैं । गुण ही पर्याय हैं इस समानाधिकरणता में मतुप् प्रत्यय होने पर 'गुणपर्यायवत्' यह निर्देश बन जाता है। गुणों को ही पर्याय बनाने पर जब अर्थभेद नहीं रहा; तब या तो 'गुणवत्' कहना चाहिए या फिर 'पर्यायवत्' निर्देश करना युक्त नहीं है ? भिन्न विशेषण निरर्थक हो जाता है।

उत्तर – वैशेषिक आदि द्रव्य से भिन्न 'गुण' पदार्थ मानते हैं। पर 'द्रव्य से भिन्न कोई गुण-पदार्थ नहीं है, क्योंकि द्रव्य से भिन्न वे उपलब्ध ही नहीं होते । अतः द्रव्य का ही परिणमन-परिवर्तन पर्याय कहलाता है और उसका ही भेद गुण है, भिन्न पदार्थ नहीं है । इस तरह मतान्तर की निवृत्ति के लिए पृथक् 'गुण' यह विशेषण देना उचित है।